सेम की खेती कैसे करें? बुआई, खाद, किस्म और मुनाफा [2026 Guide]

  

सेम की खेती कैसे करें? बुआई, खाद, किस्म और मुनाफा [2026 Guide]


सेम की खेती कैसे करें? (Sem Ki Kheti) – पूरी जानकारी ।


 1. परिचय


सेम (Sem) भारत की एक प्रमुख दलहनी सब्जी फसल है। इसे वैज्ञानिक भाषा में *Lablab purpureus* (L.) Sweet कहा जाता है। उत्तर भारत में इसे "सेम", महाराष्ट्र में "वाल", दक्षिण भारत में "अवरे" और बंगाल में "शिम" के नाम से भी जाना जाता है।


सेम की खेती मुख्य रूप से सब्जी के रूप में की जाती है। इसकी फलियाँ हरी या पकने के बाद सूखी दोनों ही रूपों में उपयोग की जाती हैं। हरी फलियों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन और विटामिन A, B, C भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि सेम की खेती किसानों के लिए लाभदायक मानी जाती है।


 2. सेम की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु


सेम एक गर्म और नम जलवायु पसंद करने वाली फसल है। यह फसल मुख्य रूप से खरीफ सीजन में उगाई जाती है।


- **तापमान:** सेम की अच्छी वृद्धि के लिए 20°C से 30°C तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है।

- **वर्षा:** 600–1000 mm वर्षा पर्याप्त होती है। ज्यादा बारिश या जलभराव से फसल को नुकसान पहुँचता है।

- **आर्द्रता:** मध्यम आर्द्रता वाली जलवायु इसके लिए सबसे बेहतर रहती है।

- **प्रकाश:** सेम को भरपूर धूप की जरूरत होती है।


 3. मिट्टी का चयन


सेम की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी उपज के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।


- **उपयुक्त मिट्टी:** बलुई दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो।

- **pH मान:** मिट्टी का pH 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।

- **जलभराव से बचें:** भारी clay मिट्टी में जलभराव होने की संभावना रहती है, इसलिए ऐसी मिट्टी में सेम की खेती करने से बचना चाहिए।


 4. सेम की उन्नत किस्में


भारत में सेम की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं, जो रोग प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली हैं।


| किस्म का नाम | विशेषता | उपज (क्विंटल/हेक्टेयर) |

| **पूसा सेम-2** | बेल वाली किस्म, फलियाँ लंबी, हरी और मुलायम होती हैं। | 100–120 क्विंटल |

| **पूसा सेम-3** | जल्दी पकने वाली, रोग प्रतिरोधी किस्म है। | 110–130 क्विंटल |

| **अर्का जय** | बेल प्रकार, फलियाँ चिकनी, स्वादिष्ट और अधिक उपज देती है। | 120–140 क्विंटल |

| **अर्का विजय** | झाड़ी प्रकार (Bush Type), बुवाई के 60–70 दिन में तुड़ाई शुरू हो जाती है। | 90–100 क्विंटल |

| **कोंकण भूषण** | महाराष्ट्र के लिए उपयुक्त, फलियाँ लंबी और चमकदार होती हैं। | 100–120 क्विंटल |


**सलाह:**

 अपने क्षेत्र की जलवायु को देखकर ही किस्म का चयन करें।


 5. खेत की तैयारी


सेम की अच्छी पैदावार के लिए खेत अच्छी तरह से तैयार होना चाहिए।


1. **पहली जुताई:** खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें।

2. **दूसरी-तीसरी जुताई:** इसके बाद 2–3 बार कल्टीवेटर या देशी हल से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें।

3. **खरपतवार हटाएं:** जुताई के दौरान पिछले फसल के अवशेष और खरपतवार पूरी तरह हटा दें।

4. **समतल करें:** खेत को समतल करके पाटा लगाकर खेत तैयार कर लें।

5. **गोबर की खाद मिलाएं:** आखिरी जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 10–15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला दें।


 6. बुवाई का समय और तरीका


सेम की खेती मुख्य रूप से खरीफ सीजन में की जाती है।


- **बुवाई का समय:** 

जून के आखिरी सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक (मानसून शुरू होते ही) बुवाई सबसे उपयुक्त रहती है।

- **रबी सीजन:** 

अगर सिंचाई की सुविधा हो, तो अक्टूबर–नवंबर में भी बुवाई की जा सकती है।

- **जायद सीजन:**

 सिंचाई उपलब्ध होने पर फरवरी–मार्च में भी उगाई जा सकती है।


. बुवाई का तरीका


सेम दो प्रकार की होती है – **बेल वाली (Pole Type)** और **झाड़ी वाली (Bush Type)**।


- **बेल वाली किस्में:** 

इन्हें सहारे (मचान) की जरूरत होती है। लाइन से लाइन की दूरी **1.5 मीटर – 2.0 मीटर** रखें और पौधे से पौधे की दूरी **30–45 सेमी** रखें।

- **झाड़ी वाली किस्में:** 

इन्हें सहारे की जरूरत नहीं होती। लाइन से लाइन की दूरी **60 सेमी** और पौधे से पौधे की दूरी **30 सेमी** रखें।

- **बुवाई गहराई:**

 बीजों को **3–4 सेमी** गहराई में बोएं।

- **बीज दर:** 

बेल वाली किस्म के लिए **10–12 किग्रा/हेक्टेयर** और झाड़ी वाली किस्म के लिए **15–20 किग्रा/हेक्टेयर** बीज पर्याप्त रहता है।


 7. खाद और उर्वरक प्रबंधन


सेम दलहनी फसल है, इसलिए यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता रखती है। फिर भी संतुलित खाद देने से उपज बढ़ती है।


| उर्वरक | मात्रा (प्रति हेक्टेयर) | समय |

| **गोबर की सड़ी हुई खाद (FYM)** | 10–15 टन | खेत तैयारी के समय (आखिरी जुताई में) |

| **नाइट्रोजन (N)** | 20–25 किग्रा | बुवाई के समय बेसल के रूप में |

| **फॉस्फोरस (P₂O₅)** | 40–50 किग्रा | बुवाई के समय बेसल के रूप में |

| **पोटाश (K₂O)** | 20–30 किग्रा | बुवाई के समय बेसल के रूप में |


**नोट:**

 सभी रासायनिक खादें बुवाई के समय बीजों से थोड़ी दूरी पर डालें, सीधे बीज के संपर्क में न डालें।


 8. सिंचाई प्रबंधन


सेम को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है, लेकिन सही समय पर सिंचाई देना जरूरी है।


- **बुवाई के तुरंत बाद:** अगर मिट्टी में नमी कम हो, तो हल्की सिंचाई कर दें।

- **फूल आने के समय:** यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। इस समय नमी की कमी से फूल झड़ने की संभावना बढ़ जाती है।

- **फल लगने के समय:** फल बनने की अवस्था में भी नियमित नमी बनाए रखें।

- **जरूरत अनुसार सिंचाई:** आमतौर पर 10–15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।

- **जलभराव से बचें:** खासकर बारिश के दिनों में खेत में पानी न रुकने दें।


 9. निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण


खरपतवार फसल की वृद्धि को रोकते हैं और पोषक तत्व छीन लेते हैं।


- **पहली निराई-गुड़ाई:** बुवाई के 20–25 दिन बाद करें।

- **दूसरी निराई-गुड़ाई:** जरूरत अनुसार 40–45 दिन बाद करें।

- **रासायनिक नियंत्रण:** अगर खरपतवार ज्यादा हो, तो फ्लूक्लोरालिन (1.0–1.5 लीटर/हेक्टेयर) को बुवाई से पहले मिट्टी में मिला सकते हैं (सलाह कृषि विशेषज्ञ से लें)।

- **जैविक तरीका:** हाथ से निराई करना सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।


 10. सहारा (मचान) प्रबंधन


बेल वाली किस्मों की सेम को बढ़ने के लिए सहारे की जरूरत होती है। सहारा न देने पर बेलें जमीन पर फैल जाती हैं, जिससे फल सड़ने, कीट लगने और उपज कम होने की संभावना बढ़ जाती है।


- **मचान बनाने का तरीका:** बांस, लकड़ी या मजबूत डंडियों की मदद से ट्रेलिस (जाली) या सीधा मचान बनाएं।

- **ऊंचाई:** मचान की ऊंचाई **2.0 – 2.5 मीटर** रखें।

- **समय:** बुवाई के 20–25 दिन बाद जब बेलें निकलने लगें, तभी मचान तैयार कर दें।


झाड़ी वाली किस्मों (Bush Type) को सहारे की जरूरत नहीं होती है।


 11. कीट और रोग प्रबंधन


सेम की फसल में कुछ मुख्य कीट और रोग लगते हैं। समय पर नियंत्रण करने से नुकसान से बचा जा सकता है।


. प्रमुख कीट


| कीट | पहचान | नियंत्रण उपाय |

| **माहू (Aphid)** | पत्तियों के नीचे छोटे हरे कीड़े चूसकर रस लेते हैं। | नीम का तेल 5 ml प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर इमिडाक्लोप्रिड 0.3 ml/लीटर पानी में छिड़कें। |

| **तना छेदक/फल बेधक (Pod Borer)** | फलियों में छेद कर अंदर के दाने खाते हैं। | नीम आधारित कीटनाशक (Neem Oil 5%) या स्पिनोसैड 0.3 ml/लीटर पानी में छिड़काव करें। |

| **पत्ती मोड़क कीट (Leaf Hopper/Jassid)** | पत्तियाँ मुड़कर पीली हो जाती हैं। | नीम तेल 3–5 ml/लीटर पानी या थायोमेथोक्साम 0.25 g/लीटर पानी में छिड़काव करें। |


. प्रमुख रोग


| रोग | पहचान | नियंत्रण उपाय |

| **एन्थ्रेक्नोज (Anthracnose)** | पत्तियों और फलियों पर भूरे-काले धब्बे पड़ते हैं। | कार्बेन्डाजिम 1 g/लीटर पानी या मैंकोजेब 2.5 g/लीटर पानी में छिड़काव करें। |

| **पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew)** | पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत जमती है। | सल्फर आधारित फफूंदनाशक 2–3 g/लीटर पानी में छिड़काव करें। |

| **रस्ट (Rust)** | पत्तियों पर भूरे-नारंगी रंग के फफोले बनते हैं। | प्रोपिकोनाजोल 1 ml/लीटर पानी में छिड़काव करें। |


**सलाह:** 

हमेशा कीटनाशक/फफूंदनाशक छिड़काव सुबह या शाम के समय करें और छिड़काव के 7–10 दिन बाद ही फल तुड़ाई करें।


 12. कटाई (Harvesting) और उपज


सेम की कटाई सही समय पर करने से गुणवत्ता और उपज दोनों अच्छी रहती है।


- **पहली तुड़ाई:** बेल वाली किस्मों में बुवाई के **70–80 दिन** बाद और झाड़ी वाली किस्मों में **60–70 दिन** बाद पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है।

- **तुड़ाई का समय:** हरी फलियाँ मुलायम और दाने छोटे होने पर ही तोड़ें। ज्यादा पकने पर फलियाँ सख्त हो जाती हैं और स्वाद कम हो जाता है।

- **तुड़ाई की आवृत्ति:** 7–10 दिन के अंतराल पर 2–3 बार तुड़ाई की जा सकती है।

- **उपज:** अच्छी देखभाल करने पर बेल वाली किस्मों से **100–140 क्विंटल/हेक्टेयर** और झाड़ी वाली किस्मों से **80–100 क्विंटल/हेक्टेयर** हरी फलियों की उपज प्राप्त होती है।


 13. लागत और लाभ (आर्थिक विश्लेषण)


सेम की खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल है।


| खर्च का मद | अनुमानित खर्च (प्रति हेक्टेयर) (₹) |

| **जुताई, तैयारी व बुवाई** | ₹3,000 – ₹4,000 |

| **बीज** | ₹1,500 – ₹2,000 |

| **खाद-उर्वरक** | ₹3,000 – ₹4,000 |

| **सिंचाई, निराई-गुड़ाई** | ₹2,000 – ₹3,000 |

| **कीटनाशक-फफूंदनाशक** | ₹1,000 – ₹1,500 |

| **मचान (बेल वाली किस्म)** | ₹2,000 – ₹3,000 |

| **कुल अनुमानित लागत** | **₹12,000 – ₹15,000** |


**आय का अनुमान:**


- बाजार भाव (हरी फलियाँ): ₹15 – ₹40 प्रति किलो (मौसम पर निर्भर करता है)

- औसत उपज: 100 क्विंटल = 10,000 किलो

- औसत आय: ₹1,50,000 – ₹2,00,000 प्रति हेक्टेयर

- **शुद्ध लाभ:** लगभग **₹1,35,000 – ₹1,85,000 प्रति हेक्टेयर**


*(बाजार भाव स्थानीय मंडी पर निर्भर करता है।)*


सेम की खेती कैसे करें? बुआई, खाद, किस्म और मुनाफा [2026 Guide]


 14. निष्कर्ष


सेम की खेती किसानों के लिए बहुत लाभदायक है, खासकर छोटे और मध्यम किसानों के लिए। अगर सही समय पर बुवाई की जाए, संतुलित खाद दी जाए, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग प्रबंधन समय पर किया जाए, तो सेम से अच्छी उपज और बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है।


खेती में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है – **समय पर देखभाल और सही तकनीक का उपयोग**।


 15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 


**प्रश्न 1. सेम की खेती कब करें?**


उत्तर: सेम की खेती मुख्य रूप से जून–जुलाई (खरीफ) में मानसून शुरू होते ही करें। सिंचाई सुविधा हो तो अक्टूबर–नवंबर (रबी) में भी कर सकते हैं।


**प्रश्न 2. सेम को सहारे की जरूरत होती है क्या?**


उत्तर: बेल वाली किस्मों को सहारे (मचान) की जरूरत होती है। झाड़ी वाली (Bush Type) किस्मों को सहारे की जरूरत नहीं होती है।


**प्रश्न 3. सेम में सबसे ज्यादा नुकसान कौन से कीट करते हैं?**


उत्तर: माहू (Aphid), फल बेधक (Pod Borer) और पत्ती मोड़क कीट (Jassid) सेम की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं।


**प्रश्न 4. सेम की पहली तुड़ाई कब होती है?**


उत्तर: झाड़ी वाली किस्मों में 60–70 दिन बाद और बेल वाली किस्मों में 70–80 दिन बाद पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है।


**प्रश्न 5. सेम की खेती में जलभराव से कैसे बचें?**


उत्तर: खेत में अच्छी जल निकासी होनी चाहिए। बारिश ज्यादा हो तो खेत में पानी न रुकने दें और जरूरत से ज्यादा सिंचाई न करें।


**प्रश्न 6. सेम की एक हेक्टेयर में कितनी उपज होती है?**


उत्तर: सही देखभाल करने पर बेल वाली किस्मों से 100–140 क्विंटल/हेक्टेयर और झाड़ी वाली किस्मों से 80–100 क्विंटल/हेक्टेयर हरी फलियों की उपज मिलती है।



Write ✍️ by alpana 

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