1. परिचय
मसूर (Masoor) भारत की एक प्रमुख रबी दलहनी फसल है। इसे वैज्ञानिक भाषा में *Lens culinaris* Medik. कहा जाता है। मसूर की दाल प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स से भरपूर होती है। यही कारण है कि यह भारतीय भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मसूर की खेती मुख्य रूप से सूखा सहन करने वाली फसल मानी जाती है। कम पानी में भी अच्छी उपज दी जा सकती है, इसलिए यह उन क्षेत्रों के लिए बहुत लाभदायक है जहाँ सिंचाई की सीमित सुविधा होती है। भारत में मसूर की खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और झारखंड में की जाती है।
2. मसूर की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
मसूर एक ठंडी जलवायु पसंद करने वाली रबी फसल है।
. तापमान:
. वृद्धि अवस्था:
फसल की अच्छी वृद्धि के लिए 15°C – 20°C तापमान बेहतर रहता है।
. फूल व दाना बनने की अवस्था:
इस समय 10°C – 15°C तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है।
. वर्षा:
मसूर को कम वर्षा की जरूरत होती है। 400–500 mm वर्षा पर्याप्त होती है।
. आर्द्रता:
कम आर्द्रता वाली ठंडी जलवायु मसूर की फसल के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।
. प्रकाश:
इसे भरपूर धूप की जरूरत होती है।
3. मिट्टी का चयन
मसूर की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी उपज के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।
. उपयुक्त मिट्टी:
बलुई दोमट, दोमट या हल्की दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो।
. pH मान:
मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
. जलभराव से बचें:
भारी चिकनी मिट्टी (Clay Soil) में जलभराव होने की संभावना रहती है, इसलिए ऐसी मिट्टी में मसूर की खेती करने से बचना चाहिए।
. सूखा सहनशील:
मसूर मध्यम सूखा सहन कर सकती है, इसलिए यह कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
4. मसूर की उन्नत किस्में
उच्च उपज और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना बहुत जरूरी है।
*सलाह:*
अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी को देखकर ही किस्म का चयन करें।
5. खेत की तैयारी
मसूर की अच्छी पैदावार के लिए खेत को भुरभुरा और समतल तैयार करना जरूरी है।
1. पहली जुताई:
खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें।
2. दूसरी-तीसरी जुताई:
इसके बाद 2–3 बार कल्टीवेटर या देशी हल से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें।
3. खरपतवार हटाएं:
पिछली फसल के अवशेष और जंगली खरपतवार पूरी तरह हटा दें।
4. समतल करें:
खेत को अच्छी तरह समतल करके पाटा लगाकर तैयार कर लें।
5. गोबर की खाद मिलाएं:
आखिरी जुताई के समय प्रति हेक्टेयर **10–12 टन** अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला दें।
6. बुवाई का समय, बीज दर और तरीका
मसूर की खेती मुख्य रूप से **रबी सीजन** में की जाती है।
बुवाई का समय:
मसूर की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय **15 अक्टूबर से 10 नवंबर** तक माना जाता है।
समय से बुवाई:
समय पर बुवाई करने से उपज अच्छी मिलती है और रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
देर से बुवाई (15 नवंबर के बाद):
करने पर उपज में कमी आ सकती है।
बीज दर
- बुवाई विधि (छिड़काव):
**40–45 किग्रा/हेक्टेयर**
- लाइन बुवाई:
**30–35 किग्रा/हेक्टेयर**
लाइन बुवाई करने से खरपतवार नियंत्रण आसान होता है और उपज भी बेहतर मिलती है।
बुवाई की गहराई और दूरी
- बुवाई गहराई:
बीजों को 3–4 सेमी. गहराई में बोएं।
- लाइन से लाइन की दूरी:
30 सेमी. रखें।
- पौधे से पौधे की दूरी:
स्वाभाविक रूप से निकलने दें (पतलेपन की स्थिति में 10–15 दिन बाद thinning कर सकते हैं)।
🌿 बीज उपचार (बहुत जरूरी)
बीज बोने से पहले उपचार अवश्य करें, इससे रोग व कीटों से बचाव होता है।
1. राइजोबियम कल्चर:
प्रति किग्रा बीज में **200 ग्राम राइजोबियम कल्चर** मिलाकर उपचार करें। यह फसल को वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करने में मदद करता है।
2. ट्राइकोडर्मा विरिडी:
प्रति किग्रा बीज में **5–10 ग्राम ट्राइकोडर्मा** मिलाकर उपचार करें (जड़ गलन व उकठा रोग से बचाव के लिए)।
3. थायरम या कार्बेन्डाजिम:
अगर बीज पुराना हो, तो प्रति किग्रा बीज में **2 ग्राम थायरम + 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम** मिलाकर उपचार कर सकते हैं।
4. उपचार के बाद:
बीज उपचार के तुरंत बाद बुवाई करें (सूखने के बाद न बोएं)।
7. खाद और उर्वरक प्रबंधन
मसूर दलहनी फसल है, इसलिए यह नाइट्रोजन की आंशिक जरूरत खुद पूरी कर लेती है। फिर भी संतुलित उर्वरक देने से उपज बढ़ती है।
**नोट:**
सभी उर्वरक बुवाई के समय लाइन में बीज से **5–7 सेमी दूर** डालें, सीधे बीज के संपर्क में न डालें।
8. सिंचाई प्रबंधन
मसूर की फसल कम पानी में उगाई जाती है, लेकिन फूल आने और दाना भरने की अवस्था में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।
. पहली सिंचाई:
बुवाई के **30–35 दिन बाद** (पौध वृद्धि अवस्था में) जरूरत अनुसार हल्की सिंचाई करें।
. दूसरी सिंचाई:
फूल आने के समय (60–65 दिन बाद)
यह सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। इस समय पानी की कमी से फूल व फलियाँ झड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
. तीसरी सिंचाई (जरूरत पड़ने पर):
दाना भरने की अवस्था (75–80 दिन बाद) में अगर मिट्टी में नमी कम हो तो हल्की सिंचाई करें।
. सावधानी:
मसूर को जलभराव बिल्कुल पसंद नहीं है। सिंचाई हल्की और खेत में पानी रुकने न दें।
9. निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार मसूर की फसल के लिए सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाने वाला कारक है, खासकर प्रारंभिक अवस्था में।
- पहली निराई-गुड़ाई:
बुवाई के **20–25 दिन बाद** करें।
- दूसरी निराई-गुड़ाई:
जरूरत अनुसार **40–45 दिन बाद** करें।
- रासायनिक खरपतवार नियंत्रण:
बुवाई के तुरंत बाद (Pre-emergence) पेंडीमेथालिन 30% EC @ 3.0 लीटर/हेक्टेयर को 500–600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। (कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही उपयोग करें)
- जैविक तरीका:**
हाथ से निराई-गुड़ाई करना सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।
10. कीट और रोग प्रबंधन
मसूर की फसल में मुख्य रूप से कुछ कीट और रोग लगते हैं। समय पर नियंत्रण करने से नुकसान से बचा जा सकता है।
प्रमुख कीट
**सलाह:**
कीटनाशक व फफूंदनाशक का छिड़काव **सुबह या शाम के समय** ही करें। छिड़काव के **15–20 दिन बाद** ही फसल की कटाई करें।
11. कटाई, मड़ाई और भंडारण
मसूर की कटाई सही समय पर करने से दाने चमकदार रहते हैं और नुकसान कम होता है।
.कटाई का समय:
जब पत्तियाँ पीली होकर झड़ने लगें, फलियाँ भूरी हो जाएं और दाने कठोर हो जाएं (चबाने पर आवाज आए) – तब कटाई करें।
. कटाई की अवधि:
सामान्यतः बुवाई के **110–130 दिन** बाद कटाई उपयुक्त रहती है (किस्म पर निर्भर करता है)।
. कटाई विधि:
पौधों को हाथ से या दरांती से काटकर खेत में ही 2–3 दिन के लिए सूखने के लिए छोड़ दें।
. मड़ाई (Threshing):
सूखने के बाद पौधों की मड़ाई बैलों से या थ्रेशर मशीन से करें।
. ओसाई व सफाई:
दानों को अच्छी तरह साफ करके छाँट लें।
. भंडारण:
दानों को पूरी तरह सूखा (नमी 10–12% से कम) करके वायु रहित बोरियों में भरकर ठंडी, सूखी जगह पर रखें। कीड़ों से बचाव के लिए नीम की पत्तियाँ या उचित भंडारण दवा का उपयोग कर सकते हैं।
12. उपज
सही देखभाल करने पर मसूर से अच्छी उपज प्राप्त होती है।
- औसत उपज:
15–18 क्विंटल/हेक्टेयर
- उन्नत प्रबंधन से उपज:
18–20 क्विंटल/हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है।
13. लागत और लाभ (आर्थिक विश्लेषण)
मसूर की खेती कम लागत में अच्छा लाभ देने वाली फसल है।
**आय का अनुमान:**
- बाजार भाव (मसूर दाना): ₹60 – ₹90 प्रति किलो (मौसम व गुणवत्ता पर निर्भर)
- औसत उपज: 16 क्विंटल = 1600 किलो
- औसत आय: ₹96,000 – ₹1,44,000 प्रति हेक्टेयर
- शुद्ध लाभ: लगभग **₹85,000 – ₹1,30,000 प्रति हेक्टेयर।
*(बाजार भाव स्थानीय मंडी पर निर्भर करता है।)*
14. निष्कर्ष
मसूर की खेती कम पानी में उगाई जाने वाली लाभदायक रबी दलहनी फसल है। समय पर बुवाई, संतुलित खाद, उचित सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग प्रबंधन सही तरीके से करने पर किसान अच्छी उपज के साथ बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
👍 मसूर की खेती में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है
**समय पर बुवाई और प्रारंभिक अवस्था में फसल की सही देखभाल**।
15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
**प्रश्न 1. मसूर की खेती कब करें?**
उत्तर: मसूर की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय **15 अक्टूबर से 10 नवंबर** तक है। समय पर बुवाई करने से उपज बेहतर मिलती है।
**प्रश्न 2. मसूर की खेती में कितनी सिंचाई की जरूरत होती है?**
उत्तर: सामान्यतः मसूर को 1–2 सिंचाई की जरूरत होती है। पहली सिंचाई 30–35 दिन बाद और दूसरी सिंचाई फूल आने के समय (60–65 दिन बाद) करनी चाहिए।
**प्रश्न 3. मसूर की बुवाई लाइन में करें या छिड़काव में?**
उत्तर: लाइन बुवाई (30 सेमी दूरी) सबसे बेहतर रहती है। इससे खरपतवार नियंत्रण आसान होता है और उपज भी अधिक मिलती है।
**प्रश्न 4. मसूर में रस्ट रोग कैसे नियंत्रित करें?**
उत्तर: रस्ट रोग प्रारंभिक अवस्था में दिखते ही **प्रोपिकोनाजोल 1 ml/लीटर पानी** में मिलाकर छिड़काव करें। जरूरत पड़ने पर 10–15 दिन बाद दूसरा छिड़काव भी कर सकते हैं।
**प्रश्न 5. मसूर की एक हेक्टेयर में कितनी उपज होती है?**
उत्तर: अच्छी देखभाल करने पर मसूर की औसत उपज **15–18 क्विंटल/हेक्टेयर** और उन्नत प्रबंधन से **18–20 क्विंटल/हेक्टेयर** तक मिलती है।
**प्रश्न 6. मसूर की खेती कम पानी में हो सकती है क्या?**
उत्तर: हाँ, मसूर सूखा सहनशील फसल है। यह कम पानी में भी अच्छी उपज दे सकती है, यही वजह है कि यह शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।



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